हाथो में खंजर देखा

कहीं मुहब्बत का दरिया तो कहीं समंदर देखा|
मालिक,
अजीब तेरी दुनिया का मंजर देखा ||

जिसे हमने अपना समझा वो गैर निकला |
उसकी जुबा पर प्यार, हाथो में खंजर देखा ||


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10 टिप्पणियाँ:

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया !!

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बहुत बढिया!!
बहुत बढिया मुक्तक है।बधाई स्वीकारें।

वेदिका ने कहा…

wah!!!

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया !!

himani ने कहा…

sirf accha nahi likha hai simit shabdo mein tikhapan hai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

रचना के साथ-साथ चित्र भी बहुत बढ़िया है!
बधाई!

भूतनाथ ने कहा…

bas theek-thaak hai....bahut acchhi nahin.....

वन्दना ने कहा…

वाह्………क्या बात कह दी चंद शब्दों मे ही…………बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

ठाकुर पदम सिंह ने कहा…

भाव अच्छे हैं ... बधाई
तकनीक और अच्छी हो सकती थी ....
निरंतरता बनाए रखें

वीनस केशरी ने कहा…

रचना + चित्र = उम्दा :)