जिन्दगी के जहर को अमृत समझ कर पी गई |
मैं हर गम के दौर में मुस्कुरा कर जी गई ||
अब मौत बेचारी मुझे क्या मार सकेगी |
लाखों दिलों में जो प्यार बन कर जी गई ||

मैं हर गम के दौर में मुस्कुरा कर जी गई ||
अब मौत बेचारी मुझे क्या मार सकेगी |
लाखों दिलों में जो प्यार बन कर जी गई ||
:- यशोदा कुमावत